Mahatma Gandhi Jayanti: बापू के लिए वे फैसले, जिन पर आज भी है विवाद

Mahatma Gandhi Jayanti: बापू के लिए वे फैसले, जिन पर आज भी है विवाद

Mahatma Gandhi ने अपने कहा था, कि "हर व्यक्ति को अपने विश्वास को तर्क के साथ तौलना चाहिए. जिस दिन विश्वास अंधा हो जाता है, उस दिन उसकी मृत्यु हो जाती है." इस बात का जिक्र क्यों किया गया है, वह आप थोड़ी देर में समझ जाएंगे. इसमें कोई शक नहीं है, कि Mahatma Gandhi और उनके विचार, हमारे देश की संस्कृति के लिए अमूल्य हैं. अहिंसा, सत्य और त्याग की जो परिभाषा उन्होंने दुनिया के सामने रखी, उसने उन्हें विश्व नायक बना दिया. जो खुद एक लाठी के सहारे चलकर बंदूकधारियों से लड़ता था, जो अपने दुश्मनों से भी प्रेम करता था, कुछ ऐसा था राष्ट्रपिता Mahatma Gandhi का व्यक्तित्व.

देश ने आजादी के लिए लंबा संघर्ष किया. Mahatma Gandhi इस संघर्ष की एक अहम कड़ी थे. देश के सभी लोगों को उन पर भरपूर विश्वास था, फिर चाहे वह पढ़े लिखे सम्पन्न परिवार के नेहरू हों, या पश्चिम चंपारण की एक झोपड़ी में रहने वाला किसान. लोगों का उन पर इतना विश्वास था, कि बंटवारे के बाद जब बंगाल में हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के खिलाफ तलवार तान कर खड़े थे, तब Mahatma Gandhi के वहां पहुंचते ही सब कुछ शांत हो गया था. जितने भी लोग दंगे करने आये थे, वह अपने हथियार महात्मा के चरणों में सौंप कर चले गए. 

मगर Mahatma Gandhi पर विश्वास करने वाले कई लोगों ने, कुछ दिनों बाद, विश्वास को तर्क के साथ तौलना शुरू किया. अलग-अलग लोग और अलग-अलग तर्क, कुछ आधे अधूरे तर्क, कुछ कच्चे-पक्के तर्क, कुछ परिस्थितियों को बिना समझे दिए गए तर्क, कुछ परिणामों को जानने के बाद के तर्क, इन अजीबो गरीब और कई तर्कों के तराजू ने गांधी द्वारा लिए गए कई फैसलों को विवादों के बीच में लाकर खड़ा कर दिया.

हम सभी Mahatma Gandhi के जीवन की वास्तविकता से तो परिचित हैं ही, आइए उनके जीवन से जुड़े उन प्रसंगों को जानें जो आज भी विवादित माने जाते हैं. साथ ही इन फैसलों की वास्तविकता को भी जांचते हैं.

Mahatma Gandhi के जीवन से जुड़े कुछ विवाद

भगत सिंह को फांसी

यह एक बहुत गर्म मुद्दा है, और अक्सर लोगों के खून को उबाल देता है. कई लोगों का मानना है कि Mahatma Gandhi भगत सिंह को बचा सकते थे, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया. कुछ लोग तो यह भी कहते हैं, कि Mahatma Gandhi की आज्ञा से ही भगत सिंह को फांसी हुई थी. यह सभी तर्क अधूरे और कच्चे हैं.

जब भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई, उस वक्त Mahatma Gandhi जेल में थे. जब वह जेल से बाहर निकले तो गांधी और इरविन के बीच में समझौता हुआ. कई लोगों का मानना है, कि अगर इस समझौते से पूर्व गांधी भगत सिंह बचाने की शर्त रखते, तो उन्हें फांसी नहीं होती. Mahatma Gandhi उन लोगों में से हैं जो अपनी हर गलती की पूरी जिम्मेदारी लेते थे. सुभाष चंद्र बोस ने भी लिखा है, कि भगत सिंह को बचाने के लिए जितने प्रयास किए जा सकते थे, वह सब गांधी ने किए. गांधी ने 3 चिट्ठियां भी लिखीं, जिसमें फांसी की सज़ा को उम्रकैद में तब्दील करने की मांग भी की गयी थी.

Mahatma Gandhi के रहते क्यों हुआ देश का बंटवारा?

बंटवारा होने के कुछ साल पहले तक, जब एक अलग देश बनाने की मांग उठी, तब Mahatma Gandhi ने कहा, कि इस देश का विभाजन उनके मृत शरीर के ऊपर होगा. लेकिन एक वक्त ऐसा आया कि Mahatma Gandhi भी विभाजन के लिए 

तैयार हो गए. अब लोग यह तर्क देते हैं कि अगर गांधी अड़ जाते तो देश शायद नहीं बंटता. मगर हम अगर उस वक्त की परिस्थितियों को देखें, तो देश में कई जगह पर दंगे हो रहे थे, अशांति का माहौल था, ऐसा भारत, क्षेत्र में विशाल जरूर होता मगर आंतरिक अशांति से भरपूर होता. साथ ही देश के बंटवारे को लेकर होने वाले दंगों में लोगों का मारा जाना, और क्रूर हिंसा ने भी उस वक़्त के सम्पूर्ण नेताओं को हताश कर दिया था.

सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस का अध्यक्ष न बनने देना

सुभाष चंद्र बोस, दूसरी बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे. लेकिन गांधी चाहते थे कि कांग्रेस के अध्यक्ष इस बार अबुल कलाम आजाद बनें. मगर अबुल कलाम आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस के साथ कोई प्रतियोगिता नहीं करना चाहते थे, तो उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया. टैगोर ने भी गांधी को लिखा था, कि इस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष को आधुनिक विचारों वाले एक नेता की जरूरत है, जिसके लिए सुभाष चंद्र बोस एक सटीक व्यक्तित्व हैं. गांधी के दबाव के कारण, सुभाष चंद्र बोस को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा था. गांधी के इस निर्णय की भी बहुत ज्यादा आलोचना होती है. कई लोगों का मानना है, कि अगर सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस में ठहरते, तो देश की नियति शायद कुछ और ही हो सकती थी.

सरदार पटेल की जगह नेहरू बने प्रधानमंत्री

आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में, जब सबने पटेल के नाम को सुझाया तो उस वक्त Mahatma Gandhi ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को चुना. नेहरू, जिन्हें उस वक्त किसी का समर्थन प्राप्त नहीं था, केवल Mahatma Gandhi की राय के कारण भारत का पहले प्रधानमंत्री बन गए. इस मुद्दे पर भी एक लंबी बहस चलती रहती है. लोगों का मानना है, कि अगर सरदार पटेल जैसा नेता देश का पहला प्रधानमंत्री बनता तो शायद हम चीन से युद्ध नहीं हारे होते. खैर, इन विवादों को केवल एक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि अलग-अलग बिंदुओं से देखना चाहिए. उस वक्त घट रही घटनाओं को, वक्त की मांग, और भविष्य की नीतियों को समझ कर भी एक बार परखना चाहिए.

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