West Bengal Violence: एक नज़र बंगाल में राजनीतिक हिंसा के बदलते चेहरों पर

West Bengal Violence: एक नज़र बंगाल में राजनीतिक हिंसा के बदलते चेहरों पर

West Bengal में चुनाव और हिंसा का काफी पुराना और गहरा रिश्ता है. अक्सर जब भी वहां चुनाव होते हैं, तब किसी न किसी हिंसा की खबर ज़रूर सामने आती है. राजनीतिक पार्टियां आपसी गहमागहमी के चलते एक दूसरे पर इसका आरोप थोपने की कोशिश करती हैं. लेकिन यह बात भी सत्य है की बंगाल में आज तक जितने भी चुनाव हुए हैं, उसमें किसी न किसी पार्टी के कोई ना कोई सदस्य की मृत्यु ज़रूर सुनने को मिली है. आज हमने अपने इस लेख में West Bengal में हुई कुछ चुनावी झड़पों को इकट्ठा करके लिखा है. आइये इन पर एक नज़र डालते हैं. 

जब मार्क्सवादियों ने पहली बार चखा सत्ता का स्वाद (1967-1977) :

  • साल 1967 में संयुक्त मोर्चा सरकार के गठन के माध्यम से West Bengal में मार्क्सवादियों ने पहली बार सत्ता का स्वाद चखा. खासकर ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस अपनी सत्ता खो रही थी, राज्य की दो प्राथमिक संरचनाओं, कांग्रेस और कम्युनिस्टों के बीच युद्ध खूनी और व्यापक था.
  • तीन साल बाद, राजनीतिक जलन के सबसे भयानक प्रदर्शनों में से एक में, बर्दवान में साई परिवार के सदस्यों को 17 मार्च, 1970 को मार दिया गया. पीड़ित कांग्रेस के उत्साही अनुयायी थे, जिन्होंने सीपीआई (एम) के प्रति निष्ठा को बदलने से इनकार कर दिया था.
  • फरवरी 1971 में आम चुनावों से ठीक पहले, अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लॉक के राष्ट्रीय सचिव हेमंत बसु की कोलकाता में हत्या कर दी गई थी. ब्लॉक नेताओं के एक वर्ग ने माकपा पर उंगलियां उठाईं, जबकि बाद में कांग्रेस को दोषी ठहराया गया. इन सबके बीच असली हत्यारा कभी पकड़ा नहीं गया.

रिकॉर्ड बताते हैं कि, साल 1972 और साल 1977 के बीच Siddhartha Shankar Ray के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने तब अति-वामपंथियों के खिलाफ एक भयंकर हमला किया. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi चाहती थीं कि, आंदोलन को कुचल दिया जाए. Ray के शासन में पुलिस अत्याचार और फर्ज़ी मुठभेड़ों के अनगिनत आरोप लगाए गए.

  • मार्क्सवादी साल 1977 में सत्ता में लौटें और इस बार 34 साल तक अपनी जड़ें जमाई रखीं. राज्य की सत्ता पर उनकी पकड़ का एक प्रमुख तत्व ग्रामीण राजनीतिक और सरकारी तंत्र पर उनका नियंत्रण था. जबकि वामपंथियों ने प्रगतिशील भूमि सुधार उपायों की शुरुआत की और बड़े पैमाने पर समर्थन का आनंद लेना जारी रखा, लेकिन यह भी ज़बरदस्ती और हिंसा पर निर्भर था.

बुद्धदेव भट्टाचार्य के शासन के दौरान हिंसा (2000) : 

आम चुनाव के लगभग एक साल बाद 27 जुलाई, 2000 को West Bengal के बीरभूम ज़िले के सुचपुर गांव में माकपा कार्यकर्ताओं द्वारा 11 भूमिहीन मुस्लिम मज़दूरों की हत्या की गई. ये एक बड़ी घटना थी, जिसने Mamata Banerjee को Jyoti Basu के शासन के दौरान उभरने में मदद की.

  • इन हत्याओं ने देश को हिलाकर रख दिया. इसमें अधिकांश आरोपी पुरुषों को दोषी ठहराया गया. बुद्धदेव भट्टाचार्य, जिन्होंने नवंबर 2000 में पदभार संभाला था, अपने कार्यकाल के पहले वर्षों के दौरान शांति सुनिश्चित करने में कामयाब रहे. लेकिन जब उन्होंने नए उद्योग स्थापित करने की कोशिश की और भूमि अधिग्रहण का मुद्दा सामने आया, तो चीजें बदल गईं.
  • इसके बाद साल 2003 के पंचायत चुनावों के दौरान 76 लोग मारे गए.
  • साल 2008 West Bengal के पंचायत चुनावों में हिंसा हुई थी, जिसमें 20 से अधिक लोगों की जान चली गई थी. यहां तक कि वाम मोर्चा के सहयोगी, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (RSP) और सीपीआई (एम), दक्षिण 24 परगना ज़िले के कुछ गांवों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए एक लंबी लड़ाई में शामिल हो गए. वरिष्ठ RSP नेता और सिंचाई मंत्री सुभाष नस्कर की रिश्तेदार गौरी नस्कर, मंत्री के पैतृक घर में हुए विस्फोट में घायल हो गईं, जबकि उनके भतीजे उदय नस्कर के घर पर हमला किया गया. RSP ने माकपा समर्थित गुंडों पर आरोप लगाया. वहीं वामपंथी नेता थके हुए थे क्योंकि कुछ जगहों पर RSP समर्थकों ने जवाबी कार्रवाई भी की थी.
  • एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2009 के लोकसभा चुनावों में भारत में दर्ज कुल 5,315 मतदान अपराधों में से 18% पश्चिम बंगाल में हुए थे.

वामपंथ का पतन (2011) :

साल 2011 में सत्ता संभालने से पहले Mamata Banerjee ने चीज़ों को व्यवस्थित करने का वादा किया था. उन्होने कहा था कि, "हम बदलाव की राजनीति लाएंगे, प्रतिशोध की नहीं."

  • लोकसभा और राज्यसभा चुनावों के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के वार्षिक रिकॉर्ड आंकड़ों के अनुसार ये कहा गया था कि, West Bengal में हिंसा और चुनाव साथ-साथ चलते हैं.
  • साल 2013 के पंचायत चुनावों में भी 39 लोगों की मौत हुई, जबकि साल 2018 के चुनावों में 29 राजनीतिक दलों के सदस्य मारे गए. साल 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान, चुनाव संबंधी हिंसा में पूरे भारत में मारे गए 16 राजनीतिक कार्यकर्ताओं में से 44% West Bengal में थे. इसी तरह, साल 2019 के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि, घायल हुए 2,008 राजनीतिक कार्यकर्ताओं में से 1,298 West Bengal में थे.
  • वहीं साल 2021 में हुए चुनावों के दौरान भी West Bengal में हिंसा हुई और उस समय लगभग 12 लोगों की मौत की ख़बर आई. इनमें से कुछ TMC समर्थक थे और कुछ BJP के समर्थक.

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